पंजाब में न्यायिक अधिकारियों के लिए आवास और अदालतों के बुनियादी ढांचे की कमी को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि कई जिलों में जज किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं, जो न्यायिक स्वतंत्रता और गरिमा के लिहाज से चिंताजनक स्थिति है। 60 प्रतिशत जजों और यहां तक कि जिला एवं सत्र न्यायाधीश के किराये पर रहने की जानकारी को हैरानी वाला बताते हुए हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव से हलफनामा तलब किया है।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी जज का मकान मालिक ही अदालत में याचिकाकर्ता बनकर पहुंच जाए तो स्थिति कितनी असहज हो सकती है। इस दौरान मोहाली की एक घटना का भी संदर्भ दिया गया जहां जज ग्राउंड फ्लोर पर और मकान मालिक ऊपर की मंजिल पर रह रहा था।

कोर्ट के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार पंजाब में 60 प्रतिशत जज किराए के मकानों में रह रहे हैं। मोगा में जिला एवं सत्र न्यायाधीश तक को किराये के घर में रहना पड़ रहा है। कोर्ट को बताया गया कि मोहाली में न्यायिक अधिकारियों के लिए आवासीय जमीन देने में करीब 20 साल की देरी हुई।

कोर्ट को बताया गया कि मोगा में 1995 से जजों के लिए आवास की जरूरत बताई जा रही थी, जबकि जमीन 2015 में जाकर अधिग्रहीत हुई। पठानकोट में जमीन चिन्हित की गई, लेकिन वह संरक्षित वन क्षेत्र निकली, जिसके कारण मामला अटक गया।

हाई कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे इन देरी के कारणों पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। साथ ही मोगा, पठानकोट और मोहाली के लिए ताजा स्टेटस रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश करने को कहा गया है। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल सभी जिलों को लेकर एक साथ सुनवाई संभव नहीं है और ऐसे में इन जिलों से शुरुआत करना बेहतर होगा।

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